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    Monday, 20 July 2015

    आ रहा है 7वां पे कमिशन, IAS ऑफिसरों के मजे

    इकनॉमिक टाइम्स| Jul 19, 2015, 03.20 PM IST, नई दिल्ली: जल्द ही सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के तहत नौकरशाहों की सैलरी बढ़ जाएगी। अगर आखिरी वक्त में रिटायर सैन्य कर्मियों के लिए वन रैंक वन पेंशन की योजना आड़े नहीं आती तो आयोग अगले तीन महीनों में अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप सकता है। लेकिन, सवाल उठता है कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का सबसे ज्यादा फायदा किसे मिलेगा?

    हैरानी की बात है कि उच्च स्तर की नौकरशाही में भी अजीब सी कास्ट हायरार्की है, जिसके टॉप पर इंडियन ऐडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस यानी आईएएस अधिकारी विराजमान होते हैं। जबकि, बाकी सभी सर्विसेज के लोग उनके मातहत होते हैं। ना ही योग्यता, ना अनुभव, ना क्षेत्र की विशेषज्ञता, ना दक्षता और ना ही ईमानदारी इस कास्ट सिस्टम को बदल सकते हैं।

    यह ऐसा सिस्टम है जो यह सुनिश्चित करता है कि सिर्फ आईएएस अधिकारी ही टॉप पर पहुंच पाएं। इसकी एक मिसाल यहां भी देखी जी सकती है कि भारत सरकार के 57 सेक्रटरीज में सिर्फ और सिर्फ दो नन-आईएएस ऑफिसर हैं। इनमें एक तो राष्ट्रपति के सचिव हैं और दूसरे मामूली से पोस्टल डिपार्टमेंट के सेक्रटरी हैं। हां, इतना जरूर है कि तकनीकी पदों पर वैज्ञानिकों और कानूनी सेवा के विशेषज्ञ कार्यरत हैं, लेकिन सभी गैर-तकनीकी पदों पर आईएएस ऑफिसर ही कुंडली मार कर जमे हैं और इनकी इन्हीं कारस्तानी की वजह से संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ इधर-उधर भटकते रहते हैं।

    चूहादौड़

    उदाहरण के तौर पर इंडियन पुलिस सर्विस (आईपीएस) ऑफिसर्स होम सेक्रटरीज के पोस्ट के लिए तो फॉरेस्ट सर्विस ऑफिसर वन एवं पर्यावरण विभाग के पदों के लिए सबसे योग्य होते हैं। इसी तरह इंडियन रेवेन्यू सर्विस (आईआरएस) ऑफिसर वाणिज्य या राजस्व सचिव के पद के आदर्श उम्मीदवार होते हैं। लेकिन, आईएएस ऑफिसरों ने इन सभी पदों को अपनी मिल्कियत बना ली है। इतना ही नहीं आईएएस ने ही इन सर्विसेज की राह में दीवार खड़ी कर कास्ट सिस्टम को सांगठिन रूप दे दिया है।

    पहली बाधा तो जॉइंट सेक्रटरी के लिए पैनल निर्माण में है। यहां तक कि जॉइंट सेक्रटरी पद की योग्यता पाने के लिए एक आईपीएस को अपने बैच के आईएएस के जॉइंट सेक्रटरी के पैनल में आ जाने के दो से तीन साल बाद तक इंतजार करना होता है। उसके बाद दूसरी भारतीय सेवाओं और ग्रुप ए के केंद्रीय सेवाओं की बारी आती है।

    कुछ मामलों में तो एक आईएएस और एक गैर-आईएएस ऑफिसर के बीच की खाई 10 सालों तक हो जाती है। इससे दूसरे ऑफिसर्स अडिशनल सेक्रटरी के पैनल में भी आने के अयोग्य हो जाते हैं। यह तो साफ हो चुका है कि आईएएस के सिवा दूसरी सेवाओं ऑफिसर्स सेक्रटरी होने की रेस में पीछे छूट जाते हैं। अब कार्मिक विभाग के गड़बड़झाले पर भी नजर डाल लिया जाए। दरअसल, पैनल निर्माण और पोस्टिंग पर इसी विभाग का नियंत्रण होता है। सेक्रटरी, कार्मिक विभाग, इसके एस्टेब्लिशमेंट ऑफिसर और सिविल सर्विसेज बोर्ड आदि जगहें सिर्फ और सिर्फ आईएएस ऑफिसरों से अंटी पड़ी रहती हैं। बस इंडियन फॉरेन सर्विस (आईएफएस) के ऑफिसर ही हैं जो अपनी हकमारी नहीं करने देते। शायद प्रवेश परीक्षाओं में टॉपर रहनेवाली उनकी पहचान से उन्हें मदद मिल जाती है।

    मौजूदा सिस्टम में आप क्या जानते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि आप किसे जानते हैं यह बहुत महत्वपूर्ण है। कितनी हैरत की बात है कि एक ऑफिसर ने किस विषय का अध्ययन किया है या किस क्षेत्र में उसकी ट्रेनिंग हुई है, इसका कोई संबंध उसे मिली जिम्मेवारी से नहीं होता। मसलन, मुमकिन है कि एक डॉक्टर ताउम्र हेल्थ डिपार्टमेंट का मुंह नहीं देख सके, एक आईआईटीयन को कभी भी हाइवे प्लानिंग या पावर अथवा शहरी विकास मंत्रालय में अपनी दक्षता साबित करने का कभी मौका ही नहीं मिले। पूर्व हेल्थ सेक्रटरी जयदेव चौधरी बताते हैं, 'इस मामले में ऐतिहासिक तौर पर अन्याय हुआ है। ऐडमिनस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स कमिशन की तरह इसमें कोई खास सिफारिशें नहीं होतीं। और उन्हें सुनता भी कौन है? कोई भी कांटों भरी राह पर कदम रखना नहीं चाहता। वैसे भी पे कमिशन तो सिर्फ वेतन, भत्ता और पेंशन से ही संबंधित है।'

    सामंतशाही

    आईपीएस और पारामिलिट्री ऑफिसरों को लगता है कि उन्हें अपने जूनियर साथियों से सफाईकर्मी, रसोइये, आया, चपरासी, माली और विभिन्न घरेलू कार्यों में मदद करने वालों की तरह ट्रीट करने का दैवीय अधिकार प्राप्त है। इसलिए, जिन्हें छत्तीसगढ़ और मणिपुर में उग्रवादियों से लड़ने की ट्रेनिंग मिली हुई है, वे साहेब के टॉइलट साफ कर रहे हों या मेमसाहेब के कपड़े धो रहे हों। ऑफिसर कॉन्स्टेबल्स और जवानों को अपने रैंक और पे के साथ मिले सरकारी लाभ की तरह ही देखते हैं। यहां तक कि जो काफी समय पहले रिटायर हो चुके हैं उनके घरों पर भी तीन से चार कॉन्स्टेबल होते हैं।

    दरअसल, कई ऐसे ऑफिसरों के उदाहरण भी सामने आए हैं जिनके पास 15 से 20 आदेशपालक हैं और जिनकी सैलरी पांच लाख रुपये तक बैठती है। सैन्य बलों और खासकर आर्मी में तो यह सिस्टम और भी बदतर है। यही वजह है कि आर्थिक मामलों के पूर्व सचिव ईएएस शर्मा मौजूदा सिस्टम की खामियों को खत्म करने की जरूरत को सिद्दत से महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा, 'शासन के तकनीकी उन्नयन, सिविल सर्वेसेज की उत्पादकता बढ़ाने और ऑफिसरों की सैलरी को उनकी कौशल के स्तर से मैच करवाने की दिशा में कदम उठाने की बहुत जरूरत है।'

    Source:- navbharattimes.com

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